Sant Santaji Maharaj Jagnade
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वैश्य समाज की घटक इकाइयों में यह सर्वाधिक प्राचीन इकाइयों में यह सर्वाधिक प्राचीन इकाइयों में से सर्वप्रथम नहीं तो प्रारंभिक एक - तो निविर्वाद रूप से है । समाज के आर्थिक स्वरूप के विाककास का इतिहास बतलाता है कि प्राकृतिक सम्पदा के रूप में तिल, सरसों आदि के वाणिज्यिक उपयोग (तेल - निर्माण) आदि की सर्वप्रथम शुरूआत को जिस जन - संवग्र ने की, वे ही तेली कहलाये इस तेल - निर्माण के बाद समाज के आर्थिक जगतृ में हचल - सी मच गयी फिर तो अन्य अनेक फल - बीजों से तेल निकाले जानें लगे ।
31 जुलाई 2017 को डॉक्टर ममता साहू राष्ट्रीय महिला अध्यक्ष तथा अखिल भारतीय तैलिक साहू महासभा द्वारा कुल्लू हिमाचल प्रदेश में हिमाचल तेली एकता समाज प्रकृति की राज्य स्तरीय बैठक का आयोजन किया गया था । इस बैठक में देश भर से पदाधिकारी पधारे हुए थे ।
लखनऊ मलिहाबाद में साहू तेली समाज मे राजनीतिक व सामाजिक जागरुकता के लिए प्रतिनिधि सम्मेलन का आयोजन मलिहाबाद क्षेत्र के जु्झारु नेता ओमप्रकाश साहू 'मुन्ना' ने किया, कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि श्री अमृत लाल साहू जी (साहू राठौर चेतना महासंघ -संस्थापक व अध्यक्ष एवं पूर्व अपर जिलाधिकारी) तथा साहू राठौर चेतना महासंघ के अन्य पदाधिकारी श्री कैलाश नाथ साहू जी, लखनऊ तेली साहु समाज राजनीतिक व सामाजिक जागरुकता सम्मेलन
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जाति व्यवस्था का इतिहास पुराना नही है किन्तु वर्ण व्यवस्था प्राचीनतम है संभव है । प्रारंभिक अवस्था में कृषी कर्म ही सभी के लिए सहज रहा। कृषि अवंलबित कार्य में कुशलता भी इसकी पृष्ठभूमि बनी । यहां सत्ययुगीन किवदन्ति को स्वीकार करे तो कोल्हू निर्माण की परिकल्पना प्राचीन रही, जिसमें पेरने के लिए तेल उत्पत्ति के लिए तिल आदि बीज मिले जिससे सहज तेली का आधार कारण हुआ जो तेल एवं खली को उत्पन्न करे वही तेली.
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भारत वर्ष में सन 1931 में अंतिम बार जाति आधारित जनगणना हुई थी, जिसके आधार पर 3 से 4 प्रतिषत जनसंख्या अनुमानित है । छत्तीसगढ के रतनपुर राज्य सन 1818 से 1820 तक अंग्रेज अधीक्षक कर्नल एग्न्यू द्वारा परिवारों की गणना करायी गई थी, जिसमें साहू परिावर 9.5 प्रतिशत पाये गये । सन 1931 की जनगणना अनुसार साहू समाज की जनसंख्या 10.5 प्रतिशत थी । इसके बाद सरकार की नितियो में अनुकूलता के कारण पडोसी राज्यों से बडी संख्या में अगमन हुआ ।