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सेवा के लिए डॉक्टरी पेशा को अपनाया डॉ. धीरेन्द्र साव

23 June 2019 Sahu Teli Samaj 16 views

         मेहनत व ईमानदारी के बलबूते बड़ा से बड़ा कार्य किया जा सकता है। बस लगने की जरूरत होती है। इसी वाक्य को अपने जीवन में उतारकर सम्मान व प्रतिष्ठा के साथ जीवन जीने का सूत्र बताते हैं डॉ. धीरेन्द्र साव। सभी के मन में अपनी अलग पहचान बना पाने में सफलता हासिल की। प्राथमिक शिक्षा बुन्देली स्कूल से कक्षा पहली से सातवी तक फिर कक्षा 8वीं से 11वीं तक महासमुन्द में हुई। स्कूली पढ़ाई के दौरान कक्षा 6 वीं की पढ़ाई में नाटक मंचन के माध्यम से कार्यक्रम की प्रस्तुति दी गई। सन् 1971 की लड़ाई में भारत को जीत हुई थी इस युद्ध का नाटक मंचन के माध्यम से पूरे स्कूल के द्वारा सुन्दर प्रस्तुति दी गई। इस प्रस्तुति में आपने भी भाग लिया। कक्षा 11 वीं में एन.सी.सी का बेस्ट कैडर का सम्मान मिला। आगे की पढ़ाई सांइस कॉलेज रायपुर में हुई। सन् 1976 में छात्रसंघ का एक्जीक्यूटिव सदस्य परीक्षा में मेरिट के आधार पर दायित्व मिला। मेडिकल कॉलेज रायपुर में सन् 1978 से 83 तक पढ़ाई किए। हॉस्पीटल इंदौर में रजिस्टार के पद पर चार महीना सन् 1984-85 के मध्य दायित्व का निर्वहन किए। रायपुर मेडिकल कॉलेज में सन् 1985 से 88 तक एम.एस, सर्जरी में पढ़ाई हुई। मार्च सन् 1988 से 30 मार्च 1997 तक चिकित्सा अधिकारी के रूप में अपनी सेवाएं दी। इस दौरान पथरिया, जिला अस्पताल बिलासपुर, रायपुर पॉली क्लीनिक, शिक्षा मेडिकल कॉलेज में दिए । सन् 1991-92 में रायपुर सी.एम.हाउस में अनुदेशक के पद पर कार्य किए। सन् 1991 से 1993 तक चोइथराम अस्पताल में ए.सी.एस. के पद पर काम किया। 30 मार्च 1997 को नौकरी जीवन से त्यागपत्र देकर अपने स्वयं के व्यवसाय से जुड़ गए। उन्होंने बताया कि, शासकीय कार्यों में सीमा का, अधिकारियों का बंधन, काम की अधिकता के कारण मानसिक संतोष नही मिल पाता हैं। स्वप्रेरणा से कर्मा अस्पताल रायपुर के नाम से 16 अगस्त 1995 को गणेश चतुर्थी के दिन शुभारंभ किया। 2 बिस्तर हॉस्पीटल की शुरूआत से शुरू कर स्वास्थ्य के क्षेत्र में कदम रखकर निरंतर सफलता की सीढ़ी पर अग्रसर है।

विषम परिस्थितियों में सक्रिय योगदान:

        डॉ. साव ने चर्चा में आगे बताया कि, सन् 1993 में महामारी का भयंकर प्रकोप हुआ, बीमारी से 794 लोंगो की मौत हो गई थी। बस्तर में रहकर स्वास्थ्य सुविधा, ईलाज की सुविधा करते हुए 10 दिन रहकर महामारी को कंट्रोल करने में स्वास्थ्य विभाग की सेवा कार्य में हाथ बंटाया। टीका की समुचित व्यवस्था के साथ रोकथाम किया गया। इस अभियान के दौरान किसी भी प्रकार से राजनीतिक दौरा को रोक दिया गया था। अपोल यही की आती थी कि महामारी के रोकथाम के लिए जो जैसा हो सके सहयोग करे। प्रभावित क्षेत्र में लोंगो को आने-जाने पर प्रतिबंध लगाया गया। ताकि जो संक्रमित हैं उसके पास आने जाने से संक्रमण अधिक फैलने की संभावना बनी रहती थी। जिससे महामारी को फैलने से रोकने में सफलता मिले। व्यापक जनसमर्थन एवं स्वास्थ्य विभागों की त्वरित ईलाज की व्यवस्था से इस भयंकर महामारी को रोकने में सफलता मिली। एक और घटना के अंतर्गत सन् 1998.99 में साहू महाकुंभ रायपुर में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने आ रहे सामाजिक बंधुओं के साथ भीषण दुर्घटना हुआ। शिकारीपाली से 7 लोग बस में सवार होकर कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए रायपुर आते समय आरंग के पास दुर्घटना हो गया। उस दौरान आपके द्वारा शीघ्र समुचित स्वास्थ्य सुविधा के साथ अन्य जरूरतों को पूरा करते हुए कुशल दायित्व का निर्वहन किए।

वरिष्ठजनों का कुशल सानिध्य:

        पिताजी स्व. जीवनलाल साव समाजवादी पार्टी से जुड़कर समाज सेवा के क्षेत्र में निरंतर अपनी सेवाएँ देते रहे। इस दौरान श्री जार्ज फनाडज, श्री राज नारायण, आदरणीय इन्द्रमती केलर, श्री लालजी, लाडली मोहन निगम, मधु लिमये आदि के साथ बचपन के दिनों में सानिध्य के साथ समय व्यतीत करने का अवसर मिला। श्री पुरुषोत्तम कौशिक, श्री बृजलाल वर्मा, श्री रमेश अग्रवाल, श्री चन्द्रशेखर साहू, श्री अजीत जोगी आदि के बीच रहने का सौभाग्य मिली। एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि एक बार डॉ. लोहिया जी हमारे घर आये। फिर शौक से डॉ. लोहिया चाय बनाने लग गया। उस दौरान उनका सलूखा फटा हुआ था। मां ने उनका सलूखी फटा हुआ देख लिया तब उनसे उनका सलूखा मांगकर माँ ने उसमें टांके लगा दिए। उन्होंने माँ से कहाँ कि आपने तो नया सलूखा की बचत कर दी। इस कारण सलूखे के दर का 6 रूपये पार्टी फण्ड में जमा करने की बात कही।

समाज सेवा के क्षेत्र में काम:

        सन 1976 में सामूहिक विवाह बागबाहरा के कार्यक्रम में अपनी सहभागिता का रही। इस कार्यक्रम के दौरान आने-जाने वालों के रूकने की व्यवस्था, मीडिया में प्रसारण हेतु व्यवस्था आदि सहित विभिन्न दायित्वों का निर्वहन किया गया। इस कार्यक्रम के पश्चात आत्मज्ञान के साथ समाज के लिए कुछ करने का संकल्प किया। रायपुर आकर सन् 1976 में रामसागरपारा में रहने लगे। महाविद्यायलीन साहू छात्र संघ का गठन किया गया। इस संगठन के माध्यम से जरूरतमंद छात्र-छात्राओं को उचित सहयोग प्रदान करने का काम किया गया। रूपये चन्दा करके समाज के युवाओं के आर्थिक एवं शैक्षणिक विकास में मदद की गई। इस संगठन के लगभग सभी विद्यार्थीयों ने अच्छी मुकाम हासिलकर अपने जीवन में सफल हो रहे है।

जीवन जिनसे मिलती हैं प्रेरणा:

        डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से आप काफी प्रभावित है। आदरणीय गोबिन्दाचार्य के जीवन से भी काफी सोख मिलती हैं। अपनी बातों को सही मंच व सही जगह पर रखने की सीख मिलती है। पूज्य माताजी से हमेशा अच्छे जीवन की सीख मिलती रही। कठिन से कठिन समस्याओं का बड़ी कुशलता के साथ समाधान निकालने में महारत हासिल थी। पिताजी के जेल में रहने के दौरान किसी भी प्रकार से विचलित नहीं होने दी। धैर्य के साथ जीवन के हर समस्या को हल करने की प्रेरणा हमेशा देती रही।

युवाओं को संदेश: 

        आज की युवा पीढ़ी हमारे बेहतर भविष्य के निर्माण में अपनी महती भूमिका का निर्वहन कर सकता है। युवा शक्ति के माध्यम से समाज उत्थान के लिए समुचित प्रयास किया जा सकता है। सामाजिक संगठनों के कार्यक्रमों में अपनी भागीदारी अवश्य सुनिश्चित करें। ज्यादा से ज्यादा समाज के आयोजनों में भाग लेंवे। इस प्रकार से संगठन को मजबूती देने में अपना योगदान अवश्य देंवें। स्वच्छ एवं विकसित समाज की संकल्पना को पूरा करने में अपनी सहभागिता के साथ कार्य करे।।

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