तेलियों का दीपदान उत्सव (दिवाली)
डॉ. महेंद्र धावड़े, प्राचीन पुरातत्व इतिहास संशोधक
तेली समाज द्वारा दीपदान किए जाने और इस उत्सव से जुड़े संबंध का इतिहास अत्यंत गौरवशाली, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व का है। प्राचीन काल से ही तेली समाज का संबंध ‘प्रकाश’, ‘ऊर्जा’ और ‘धार्मिक कार्यों’ से जुड़ा हुआ है।
प्रकाश के मूल निर्माता तेली
प्राचीन काल में जब बिजली या अन्य आधुनिक साधन नहीं थे, तब दुनिया भर का अंधकार तेल के दीयों के माध्यम से दूर किया जाता था।
तेली समाज पारंपरिक रूप से विभिन्न तिलहनों—जैसे तिल, सरसों, करड़ई आदि—से घानी के माध्यम से तेल निकालने वाला समाज है।
राजा का राजमहल हो, विद्वानों की अध्ययन कक्ष हो, सामान्य व्यक्ति का घर हो या देवता का मंदिर—हर स्थान पर प्रकाश का दीया जलाने के लिए आवश्यक मुख्य साधन तेल था, जिसे तेली समाज ही उपलब्ध कराता था। इसलिए अंधकार दूर कर प्रकाश देने वाले ‘कर्मवीर समाज’ के रूप में तेली समाज को देखा जाता है।
बौद्ध धर्म में दिवाली—जिसे बौद्ध परंपरा में मुख्य रूप से ‘दीपदान उत्सव’ या ‘धम्म दीपावली’ कहा जाता है—मनाने के बारे में दो प्रमुख वैचारिक मतधाराएँ पाई जाती हैं। बौद्ध विचारकों और इतिहासकारों में इस त्योहार के स्वरूप को लेकर निम्नलिखित दो दृष्टिकोण हैं।
आज जो दिवाली हम देखते हैं, वह मूल रूप से बौद्ध संस्कृति की देन है, जिसका बाद में ब्राह्मणीकरण या हिंदूकरण हुआ।
बुद्ध और प्रकाश का सिद्धांत
बुद्ध ने “अत्ता दीपा भव:” (अपने आप को दीप/आधार बनाकर रहो) का उपदेश दिया। इसका अर्थ यह है कि बाहरी दीये जलाने से अधिक प्रज्ञा, सदाचार और आत्मजागृति से जीवन के अंधकार को दूर करना चाहिए।
इसलिए कुछ बौद्ध अनुयायी दिवाली को “प्रकाश और ज्ञान” की अवधारणा से जोड़ते हैं।
लोकप्रिय कथा
जब तथागत बुद्ध ज्ञान प्राप्ति (बुद्धत्व प्राप्ति) के बाद पहली बार अपने गृहराज्य कपिलवस्तु लौटे, तब उनके स्वागत और सम्मान के लिए राजा शुद्धोधन तथा वहाँ के नागरिकों ने पूरे शहर को दीयों की रोशनी से उजाला किया था। इस दिन की स्मृति में दीपदान करने की परंपरा है।
इस अवसर पर “अत दीपो भव” अर्थात “स्वयं प्रकाश बनो” का उपदेश दिया गया, ऐसा माना जाता है। परंतु यह कथा लोकप्रिय परंपरा में मिलती है; त्रिपिटक जैसे मूल बौद्ध ग्रंथों में दिवाली के संदर्भ में यह सीधी नोंद स्थापित नहीं है।
सम्राट अशोक का संबंध
बौद्ध इतिहास में ‘दीपदान उत्सव’ (धम्म दीपावली) का संबंध तेली समाज के गौरवशाली इतिहास से जोड़ा जाता है। विद्वानों के अनुसार, प्राचीन भारत के मौर्य साम्राज्य और गुप्त साम्राज्य का संबंध तैलिक (तेली) संस्कृति या व्यापारी वर्ग से जोड़ा जाता है।
सम्राट अशोक का दीपदान उत्सव:
महावंश और अन्य बौद्ध ग्रंथों के संदर्भों के अनुसार, सम्राट अशोक ने बौद्ध धम्म की स्वीकृति के बाद पूरे जंबुद्वीप में 84,000 बौद्ध स्तूप और विहार बनवाए। इन सभी 84,000 स्तूपों का निर्माण जिस दिन पूरा हुआ (कार्तिक अमावस्या), उस दिन सम्राट अशोक ने भव्य ‘दीपदान उत्सव’ मनाया। पूरा साम्राज्य दीयों से सजाया गया और बौद्ध भिक्षुओं को दान दिया गया।
कुछ बौद्ध समाजों में दिवाली को सम्राट अशोक के बौद्ध धम्म की स्वीकृति से जोड़ा जाता है। इस प्रकार कुछ बौद्ध दिवाली मनाते हैं।
इस महोत्सव के लिए करोड़ों दीयों के लिए आवश्यक तेल की आपूर्ति करने और स्वयं दीपदान करने की मुख्य जिम्मेदारी उस समय के तैलिक (तेली) व्यापारियों और समाज बंधुओं ने बड़े आनंद से निभाई, ऐसा इतिहासप्रेमी बताते हैं।
अनुयायी दिवाली को ‘धम्म दीपावली’ या ‘दीपदान उत्सव’ के रूप में मनाते हैं। इस दिन वे घर की सफाई करके, दीये जलाकर बुद्ध, सम्राट अशोक और बुद्धमाता महामाया को स्मरण करते हैं।
तेलियों की नंदादीप परंपरा
भारत के किसी भी मंदिर का इतिहास देखा जाए, तो 9वीं से 13वीं शताब्दी में तेली समाज आर्थिक रूप से अत्यंत समृद्ध और दानशील था।
तेली समाज में आज भी त्योहारों और विवाह समारोहों में ‘घानी’ और ‘पहार’—जिन साधनों से तेल निकाला जाता है—की पूजा की जाती है। दिवाली के समय घर में पहली बाती जलाते समय तेल देने वाले अन्नदाता और श्रमिकों का सम्मान करने की परंपरा बनी हुई है।
तेली समाज के आराध्य दैवत श्री संत संताजी महाराज जगनाडे—जो जगद्गुरु संत तुकाराम महाराज के समकालीन और उनके अभंग लिखकर रखने वाले लेखक थे—ने अपने विचारों से समाज को अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का दीया जलाने का संदेश दिया। समाज में ज्ञान का प्रकाश फैलाना भी एक श्रेष्ठ ‘दीपदान’ है, यह शिक्षा इस समाज ने संजो रखी है।
दिवाली को सम्राट अशोक और बुद्ध के आगमन का ऐतिहासिक ‘दीपदान उत्सव’ मानकर उसे बौद्ध पद्धति से मनाने पर बल दिया जाता है; जबकि दूसरा मतधारा इस त्योहार को पौराणिक हिंदू त्योहार मानता है और इसके स्थान पर केवल विजयादशमी तथा बुद्ध के मूल तात्त्विक विचारों (अत्त दीपो भव) को प्राथमिकता देता है।
तेली समाज का दीपदान का इतिहास केवल त्योहार तक सीमित नहीं है; वह “अंधकार दूर कर जगत को प्रकाश देने” के उनके मूल कर्तव्य और व्यवसाय से जुड़ा हुआ है। दिवाली या दीपदान उत्सव में प्रयुक्त तेल और दीये का मूल जनक इस समाज के पास होने के कारण उनका इतिहास प्रकाश से जुड़ा हुआ है।
डॉ. महेंद्र धावड़े, प्राचीन पुरातत्व इतिहास संशोधक, मो. क्र. 9921162727
