Sant Santaji Maharaj Jagnade
मित्रों, जिस तेली जाति में..जिस वैश्य वर्ण व समाज में हमारा जन्म हुआ है ! वह जाति..वह वर्ण परम पवित्र और अत्यंत श्रेष्ठ है !
हमारे पूर्वजों ने उस समय तिल और तिलहन की खोज की थी, तिल से तेल निकाला और सारे संसार को प्रकाश से जगमग किया था..जब सारा संसार गहन अंधकार में डुबा हुआ था, जब रात में रौशनी के लिए कोई साधन नहीं था.! हमारे महान् पर्वजों ने कोल्हू नामक यंत्र का आविष्कार किया था, जब संसार में किसी वैज्ञानिक संसाधन उपलब्ध नहीं थे..! ऐसे वैज्ञानिक पूर्वजों के प्रति हमें कृतज्ञ होना चाहिए !
प्राचीन काल में हमारी इस पवित्र जाति में अनेक संतों, भक्तों, वीरों, दानियों, सतियों और समाज सेवकों तथा महान् विभूतियों ने जन्म लिया है, जिनमें महाभारत काल के महात्मा तुलाधार, दुर्गा सप्तशती में वर्णित समाधि वैश्य, स्कन्दपुराण के..सत्यनारायण कथा के महान् पात्र साधु वैश्य, हठ योग के प्रणेता गुरुगोरक्षनाथ, कर्मा बाई साहू ने, राजिम तेलिन भक्तिन ने, दानवीर भामाशाह आदि हैं, जिन्होंने समाज के समक्ष श्रेष्ठ आदर्श रखा और सामाजिक परिवर्तन का कार्य सम्पन्न किया था ! आज पुनः हमें अपनी तेली जाति को जगाने की आवश्यकता आन पड़ी है !
भामाशाह का जन्म राजस्थान के मेवाड़राज्य के तेली परिवार में 29 अप्रैल, 1547 को हुआ था। इनके पिता भारमल थे, जिन्हें राणा साँगा नेरणथम्भौर के क़िले का क़िलेदार नियुक्तकिया था। भामाशाह बाल्यकाल सेही मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के मित्र, सहयोगी और विश्वासपात्र सलाहकार रहे थे। अपरिग्रह को जीवन का मूलमंत्र मानकर संग्रहण की प्रवृत्ति से दूर रहने की चेतना जगानेमें भामाशाह सदैव अग्रणी थे। उनको मातृ-भूमि के प्रति अगाध प्रेम था। दानवीरता के लिए भामाशाहका नाम इतिहास में आज भी अमर है। धन-संपदा का दान भामाशाह का निष्ठापूर्ण सहयोग महाराणा प्रताप के जीवन में महत्त्वपूर्ण और निर्णायक साबित हुआ था ।
मेवाड़ के इस वृद्ध मंत्री ने अपने जीवन में काफ़ी सम्पत्ति अर्जितकी थी। मातृ-भूमि की रक्षा के लिए महाराणा प्रतापका सर्वस्व होम हो जाने केबाद भी उनके लक्ष्य को सर्वोपरि मानते हुए भामाशाह ने अपनी सम्पूर्ण धन-संपदा उन्हें अर्पित कर दी। वह अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति के साथ प्रताप की सेवा में आ उपस्थित हुए और उनसे मेवाड़ के उद्धार की याचना की । माना जाता है कि यहसम्पत्ति इतनी अधिक थी कि उससे 11 वर्षों तक 25,000 सैनिकों का खर्चा पूरा किया जा सकता था । महाराणा प्रताप 'हल्दीघाटी का युद्ध' ( 18 जून, 1576 ई.) हारचुके थे, लेकिन इसके बाद भी मुग़लों पर उनके आक्रमणजारी थे। धीरे- धीरे मेवाड़ का बहुतबड़ा इलाका महाराणा प्रताप के कब्जे में आनेलगा था।
संत संताजी अध्यासन - तेली समाज
संत नामदेवा नंतर महाराष्ट्रात सामाजिक, धार्मिक, राजकीय बाबत अन्यायाची आवस्था होती. खर्या अर्थाने धर्माला ग्लानी आली होती. आशा वेळी संत तुकारामांच्या नेतृत्वा खाली शेकडो वर्षांची दडपशाही झटकून इतिहास निर्माण करण्याचे कार्य झाले. यामुळे पुढे शेकडो वर्ष जे राजकीय, सामाजिक, धार्मिक परिवर्तन धडले त्याचे शिल्पकार संत संताजी जगनाडे आहेत ते संत तुकारामांचे शिष्य, लेखनिक या त्यांच्या भुमिके पेक्षा धार्मिक व सामाजीक परिर्वतनातील लढाईतले ते एक सर सेनापती होते. हा अभिमान, हि साठवण ही आठवण हे स्फर्ती ठिकाण, ही मानवता तमाम मानव जातीची आहे. आणि याची जाणीव केंद्र शासना, राज्य शासन यांनी ठेवली, ठेवतात व ठेवावी ही लागेल म्हणुन ही तुम्हा आम्हा सर्व तेली समाज बांधवांची कार्यर्त्याची भुमीका आहे. ती आपण पार पाडतो ही पण आज मी या विचार प्रक्रिये द्वारे काही नम्र पणे विचार मांडतोय. या विचार प्रक्रियेतुन आपण मिळुन सारे श्री संताजी समाधी स्थळ भव्य करूया.
श्री. संत संताजी जगनाडे तेली संस्था सुदूंबरे या संस्थे तर्फे विकासाचा आराखडा राबवत आहे. आपण ही या विकासाला सहकार्य दृयाल हा विश्र्वास आहे. संपर्क साधा.
अध्यक्ष
मा. श्री. जनार्दन गोपाळशेठ जगनाडे
मु.पो. चाकण ,गणेश बेकरी, सुभाष् चौक, (शनि मंदिरामागे), ता. खेड जि. पुणे. मो. नं. 7350875757
खजिनदार
मा. श्री. राजेंद्र गंगाधर घाटकर
मो. नं. 9370611951
मुख्य सचिव
मा. अॅड. रामचंद्र विष्णुपंत रायरीकर
मो.नं. 9881553366